मध्य प्रदेश

आईईटी सभागृह में प्रकृति संवाद का आयोजन

इंदौर: हम चाहते हैं कि जल, जीवन, जंगल, जानवर, जन का अनुकूल विकास हो. इस धरा पर यह सिद्धांत विद्यमान हो कि जियो और जीने दो. शांति टुकड़ों में बंटकर अशांति न बने. जीवन को जोड़ने प्रकृति का उपयोग हो तोड़ने हेतु नहीं.उक्त विचार प्रकृति संवाद के शुभारंभ समारोह में प्रख्यात चिंतक , मनीषी व विचारक के.एन. गोविंदाचार्य ने व्यक्त किए. वे खंडवा रोड स्थित देवी अहिल्या विवि के आईईटी सभागृह में महाविद्यालयीन विद्यार्थियों, बुद्धिजीवियों और पद्म अवार्ड से अलंकृत विभूतियों को सम्बोधित कर रहे थे.

श्री गोविंदाचार्य ने कहा कि प्रकृति को सर्वनाश से बचाने हेतु उसके संरक्षण के साथ-साथ उसके विकास की परिकल्पना भी साकार होनी चाहिए. प्रकृति संवाद ही प्रकृति के प्रति आत्मिक भाव पैदा करते हैं और उसके प्रति लगाव उत्पन्न करते हैं. जल, वन, पर्वत, नदी सभी को शुद्ध स्वरूप में तथा अस्तित्व में बनाए रखना आज की आवश्यकता है. पूर्व लोकसभा अध्यक्ष सुमित्रा महाजन ने कहा कि प्रकृति संवाद हो तथा प्रकृति से भी संवाद हो. प्रकृति ही हमारे जीवन का आधार है. सांस लेने व सांस छोड़ने की प्रक्रिया सभी कुछ प्राकृतिक है. प्रकृति की सुरक्षा हमारा कर्तव्य है और प्राणिमात्र के जीवन का आधार भी है. इस अवसर पर पद्मश्री डॉ. ए.पी. सेलवम, पद्मश्री डॉ.श्याम सुन्दर पालीवाल , पद्मश्री जनक पलटा , पद्मश्री महेश शर्मा, पद्मश्री हिम्मतराम भांभू, पद्मश्री उमाशंकर पांडे भी मंच पर उपस्थित थे. कार्यक्रम की रूपरेखा प्रो. डॉ श्याम सुन्दर पलोड ने रखी.

स्वागत भाषण डॉ. सर्वेश खंडेलवाल ने दिया. प्रकृति संवाद की जानकारी अजीत कुमार तिवारी ने दी. कार्यक्रम में शोध स्मारिका का विमोचन भी किया गया. शोध पत्रिका के संपादक डॉ शैलेंद्र शर्मा ने मंच पर अतिथियों के हाथों विमोचन करवाया. आयोजन में मुख्य रूप से डॉ.सुबोध शर्मा काठमांडू, कुलदीप कृष्ण शर्मा जम्मू, बी.बी.वायकर मराठवाडा इत्यादि भी उपस्थित थे. संचालन रोहन शर्मा व भावना पाठक ने किया. आभार आईईटी के निदेशक डॉ.प्रतोष बंसल ने माना.

मध्य प्रदेश सरकार के लोक स्वास्थ्य अभियांत्रिकी विभाग के प्रमुख सचिव पी.नरहरि ने कहा कि भविष्य को सुरक्षित रखने हेतु स्वच्छता जरूरी है. स्वच्छता से ही स्वास्थ्य बेहतर होता है. हमारे ग्रंथो में पहला सुख निरोगी काया की अवधारणा प्रकृति के उत्थान में ही अंतर्निहित है. शोभा पैठनकर ने कहा कि उपयोगिता के अनुरूप उपभोगिता वाली जीवन शैली बनने से प्रकृति का विनाश हुआ है. हमारी ज्ञानेंद्रियां जो सुख-समृद्धि का आधार है वह लालसा का शिकार हो रही है. महामंडलेश्वर नरसिंहदास महाराज ने कहा कि हमारे धर्म ग्रंथो में पंचतत्व की पूजा की जाती है. हमारा शरीर भी पांच तत्वों से मिलकर बना है, ये पांच तत्व प्रकृति से ही हमें प्राप्त होते हैं. अतः इन्हें संजोकर रखना हमारे जीवन के लिए जरूरी है:

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