संजा लोक पर्व : प्रकृति की सृजनात्मक चैतन्य कृति
भारतीय जीवन में लोक संस्कृति का बड़ा महत्व है वे लोक व्रत हो ,त्योहार हो या लोकोत्सव हो ।सभी का मूल अवलंबन प्रकृति की उपासना आराधना ही है लोक व्रत वैयक्तिक स्तर पर तन की साधना है तो त्यौहार मन को साधते है,पर लोक के उत्सव न सिर्फ तन मन को साधते है वरन् आत्मा को परम लक्ष्य की ओर अग्रसर भी करते है।श्रीमद्भागवत गीता में श्रीकृष्ण जी ने कहा है -जो जन्मा है उसकी मृत्यु अटल है यही प्रकृति है ,जन्मने और मरने के बीच का समय जीवन है जो प्रकृति से सामंजस्य साम्य-साक्ष्य भाव रख,प्रकृति से ही प्राकट्य हो,प्रकृति में विलीन होना है,पर इस प्राकट्य और विसर्जन के बीच सृजन कर जीवन को अनन्तता प्रदान करना मनुष्य का परम धेय है। सृजन की तप्त साधना में प्रकृति के सखी भाव के स्वरूप की चैतन्यता को परिपूर्ण करता है लोक पर्व संजा।
संजा लोक पर्व मांडना रूप में परम्परागत ,कलात्मक, भित्तिचित्रात्मक ,गत्यात्मक, भावात्मक,गुढ़ात्मक ,मनोरंजात्मक, हास -परिहास से परिपूर्ण, कुँवारी बालिकाओ का षोडशी अनुष्ठानिक लोक उत्सव पर्व है जो भाद्र माह की पूर्णिमा से शुरू हो आश्विन माह (कुवार) की अमावस्या तिथी तक ‘महालय’ में जब पितरों का धरती पर आगमन होता है उन श्राद्ध पर्व के सोलह दिन तक रहता है और सर्वपितृ अमावस्या को नजदीक के जलाशयों में विसर्जन कर दिया जाता है.संजा माता ‘मांडनों’ के रूप में प्रकृति रूपी आद्य शक्ति के सखी भाव का वंदन- अभिनन्दन और अर्चन है । जिसमे जगत जननी माँ पार्वती की तरह पूजनीय सखी का ससुराल से सोलह दिनों तक पीहर में आगमन होता है ।
पर्व में कुमारी- षोडशी बालिकाओ द्वारा संजा के मांडना गोबर से दीवार या पट्टे पर बनाये जाते है, प्रतिदिन सांध्य समय जब सूर्य नारायण भगवान अस्तांचल को प्रस्थान करते है और चंद्र अपनी शीतल रश्मि को प्रसारित करने को उदयमान होने को आतुर होने लगते है ऐसी गो रज से सिंदूरी शाम में उस श्यामल गोधूलि बेला में बालिकाओ द्वारा घर -घर जाकर सामूहिक गीत गाये जाते है ,प्रसाद में ’ताड़ना’ प्रकिया कर जिसमे प्रसाद को कपड़े से ढक दिया जाता है व अन्य बालिकाओ द्वारा बताया या ’ताड़ा’ जाता है कि प्रसाद में क्या है ?उपरांत माता को ’जिमाया’ जाता है प्रसाद का वितरण किया जाता है।
संजा निमाड़, मालवा, राजस्थान , महाराष्ट्र ,उत्तर प्रदेश, हरियाणा कई राज्यों में मनायी जाती है काल परिस्थितिनुसार नाम मे भेद हो सकते है जैसे निमाड़ मालवा में ये छाबड़ी ,संजा माता है तो मालवे में संजा, सांझा,संझा,संजा माता, तो राजस्थान में संजा बाई सा तो महाराष्ट्र में गुलाबाई,बुंदेलखंड में मामुलिया तो बृज में सांझाफुली है पर मूल भाव एक सा है प्रकृति के साथ प्रकृति में प्रकृति की दैवीय आराधना ।…
सोलह दिनों तक चलने वाले गीतात्मक- मांडना पर्व को गीतों के माध्यम से जाने की दैवीय रूप सखी संजा माता का स्वरूप क्या है? संजा बाई कौन है?
संजा का गीत इस प्रकार है_
“संजा सहेलड़ि बाज़ार में खेले बजार में रमे
व कोणा जी नी बेटी व खाय खाजा रोटी
पठानी चाल चाले रजवाड़ी बोली बोले संजा एडो संजा का माथा बेड़ो “…
गीत का भाव है कि _संजा हमारी सखी है जो इतनी साहसी है कि बजार में भी घूम सकती है खेल सकती है कोना जी की बेटी है खाजा खाती है स्वाभिमानी अक्खड़ पठानी चाल से चलती है गर्वीली रजवाड़ी बोली बोलती है पर जल के प्रतीक जीवन में पनिहारिन की तरह कर्मशील है।
‘संजा’ मांडने में हर दिन मांडना निश्चित होता है – क्रम में पहले , पूनम पाटला, दूसरे दिन पड़वा की तिथि को चाँद- तारा ,पांच पांचा बनाते है , इन्हें मिटाकर द्वितीया तिथि को बिजौरा, बिजना तृतीया तिथि को घेवर, चतुर्थी तिथि को चोपड़ और पंचमी को ‘पाँच कुँवारे’ बनाए जाते हैं। लोक कहावत के मुताबिक जन्म से छठ की तिथि को विधाता किस्मत का लेखा लिखते हैं, जिसका प्रतीक है छाबड़ी। सातवें तिथि को सात्या (स्वस्तिक) या आसमान के सितारों में सप्तऋषि, आठम तिथि को ‘अठफूल’, नवम को डोकरा-डोकरी और दसमी तिथि को वंदनवार बाँधते हैं। एकादशी तिथि केले का पेड़ तो द्वादशी को लड़ता झड़ता मोर-मोरनी या जलेबी की जोड़ माँडती है।
त्रयोदशी तिथि से शुरू होता है सामाजिक समरसता से सराबोर मानवीय संवेदना से परिपूर्ण संजा बाई का किलाकोट, जिसमें बनाई गई आकृतियों के साथ नई आकृतियों का भी समावेश होता है जहाँ समाज के हर वर्ग विशेष की उपयोगिता ,योगदान, पारस्परिक अन्योन्य सामाजिक क्रियाकलापो को चित्रांकित किया जाता है, जहाँ माली का बेटा भी उतना ही सम्मानीय है जितना ब्राह्मण का बेटा, यहाँ सफाई कर्मी (मेहतर) भी उतना ही पूजनीय है जितना वाण्या (वणिक)।
संजा माता के मांडने की आकृतियों में सखी सहेली रुनझुन की बैल गाड़ी, सिंगार पेटी ,घुघरो ,नगाड़ा, तोता, कौवा, कागलो, लड़ता झाड़ता ,तुलसी क्यारा,मोर,पंखा, केले का झाड़, चौपड़ हाड़या राव जी,निसरणी,दीवाली,झारी, बाण्या की हाटड़ी ,दुकान,बजार ,बाजूर ,जाड़ी जसोदा ,पातळी प्रेमा, माली को पोर्यो, बामण , मेहतर, कुआँ, तालाब, बावड़ी, पालना, रसोई का समान, सभी इस किल्लाकोट में होता है।
यही क्रम सोलह दिनों तक चलता हैँ पहले दिन की बनी आकृति की जगह नयी आकृति बनाइ जाती है सोलहवें दिन सर्वपितृ अमावस्या को सभी सुखाई आकृतियो को टोकनियो में इकट्ठा कर गोधूलि बेला में गाँव के जलाशय में जीवन की अनंतता में प्रवाहित कर विसर्जन कर दिया जाता है ।
विसर्जन के बाद सखियां कच्चे चावल का कांचा कूलर ,ककड़ी और हलवे का प्रसाद बाँटती है वापस लौटते समय भी सभी सहेलिया खाली टोकनियो से खेल खेलती है व हारी खिलाड़ी को कहावत में ‘हाड़या राव’जी(काला कौआ) उसके भावी पति के नाम से चिढ़ाती है और इस तरह अच्छे वर की प्राप्ति की कामना शुभकामनाओ के साथ पुनः मिलने की इच्छा से सोलह दिनों तक सृजित सोलह संस्कारो से संस्कारित ,सोलह कलाओ से परिपूर्ण ,सोलह श्रंगार से श्रंगारित कुमारी-षोडश तक पूजित लोक पर्व सखी संजा का षोडशी दैवीय रूप प्रकृति के लौकिक रूप का सृजन हो अनन्त जल प्रवाह में आलौकिक विसर्जन हो जाता है और प्रागट्य होता है प्रकृति की चैतन्यता का अमूल्य उपहार ।…….
संजा गीत इस प्रकार है_
१) संजा गीत -संजा तू थारा घर जा,
थारी माय मारेगी की कुटेगी,
चाँद गयो गुजरात
की हरणी का बड़ा बड़ा दात,
की थारा पोर्या पारी डरपे ला की डर पेला……
संजा तू थारा घर जा,
थारी माय मारेगी की कुटेगी……
२) संजा का सासर जावा गा की खाटो रोटो खावागा
संजा की सासु सोकेली रस्ते चलते मारेगी
अस्सी कस्सी मारे दारी की चार गुलाटी खाएगी ……….
3) संजा बाई का लाड़ा जी लुगड़ो लाया जाड़ाजी
अस्सा कसा लाया दारी का लावता गोट किनारी का
लाया था पर लाया था रास्तो भूली आया था…..
संजा की आरती इस प्रकार हैं_
संजा की आरती
आरती भई आरती करो संजा की आरती ……
दूध म sदोरो दुलीचंद गोरो
दुलीचंद का वाड़ा म s
अइया चु चु बईया चूचू
ऊ जाणी पायाजी
दूध भरी न s ले वा चाल्या
रादूळा लटकाया जी
चलो देराणी चलो जेठानी आपा चाला पाणीजी
पाणी भरत s कावड़ छूटी
अटक बटका चावल चटका
उसमे से निकला लाल बिजौरा
सुन सुन बाबा बात करे
परदेस में परिणाई जी
राजा सरको बाप छोड़्यो
राणी सरकी माय छोड़ी
तीज सरकी बईण छोड़ी
कुँवर कन् ई या भाई जी
अच्छी सी भोजाई जी
अन्नर कन्नर जाओ संजा बाई
सासर
आरती भई आरती करो संजा की आरती….
संजा माता को जिमाना इस प्रकार है_
संजा तू जिमले चूठ ले
जीमे सारी रात
फूला भरी रे परात
चटक चांदनी सी रात
एक फूलो घाटी गयो
संजा माता रुसी गई
रुस्या प s मोर नाच्यो
एक घड़ी दो घड़ी
सवा तीन घड़ी……
वर्तमान सामाजिक परिवेश की बात हो तो हम सभी अनुभव करते है कि आधुनिकता के मखमली लिबास में सतत सामाजिक विघटन हो रहा है उसके परिणाम भी आये दिन देखने को मिलते भी है खास कर युवा पीढ़ी का भटकाव ,असहनशीलता धैर्य की कमी , संघर्ष की शक्ति का अभाव ,असफलता की अस्वीकारोक्ति जीवन को मानसिक तनाव , निराशा, में धकेल देती है मनोचिकित्सक विशेषज्ञ भी मानते है कि बड़ा कारण बच्चों की परवरिश में बदलाव है, ऐसे में “संजा_छाबड़ी” लोक पर्व उत्सव की प्रासंगिकता महत्व पूर्ण हो जाती है ,जिन्हें सहेजना अत्यावश्यक है।
-सुनीता पंडित
लोक संस्कृति प्रबंधन विशेषज्ञ
